Showing posts with label प्राथना. Show all posts
Showing posts with label प्राथना. Show all posts

Saturday, January 13, 2018

कौन कहे तेरी महिमा कौन कहे तेरी माया। - Lyrics

कौन कहे तेरी महिमा कौन कहे तेरी माया।


कौन कहे तेरी महिमा, कौन कहे तेरी माया।...
कौन कहे तेरी महिमा, कौन कहे तेरी माया।
किसी ने हे परमेश्वर तेरा।...-२ अंत कभी ना पाया।...
कौन कहे तेरी महिमा, कौन कहे तेरी माया।...
अज अमर अविनाशी कर्ण कर्ण में व्यापक है। -२
सबसे पहला उपदेशक और अध्यापक है -२
गुरुओ का भी गुरु है इश्वर।...-२ ऋषियो ने फ़रमाया।...
कौन कहे तेरी महिमा, कौन कहे तेरी माया।...
किसी ने हे परमेश्वर तेरा अंत कभी ना पाया
कौन कहे तेरी महिमा, कौन कहे तेरी माया।...

सारे सूरज चाँद सितारे भी तुझमे है। -२
सभी समुन्दर सभी किनारे भी तुझमे है। -२
श्रुष्टि के अन्दर बाहर तू।...-२  एक समान समाया।...
कौन कहे तेरी महिमा, कौन कहे तेरी माया।...
किसी ने हे परमेश्वर तेरा अंत कभी न पाया
कौन कहे तेरी महिमा, कौन कहे तेरी माया।...

हर प्रलय के बाद जगत निर्माण करें तू। -२
नियत समय पर इसका भी अवसान करें तू। -२
सदा तुझे अनगनित कंठो ने।...-२ झूम झूम कर गाया।...
कौन कहे तेरी महिमा, कौन कहे तेरी माया।...
किसी ने हे परमेश्वर तेरा अंत कभी न पाया
कौन कहे तेरी महिमा, कौन कहे तेरी माया।...

तुझको ढूंढा रात में और दिन में ढूंढा है।...-२
पूर्व पश्चिम उत्तर दक्षिण में ढूंढा है।...-२
थके पथिक सब ढूंढ-ढूंढ के।...-२ कही नज़र न आया।...
कौन कहे तेरी महिमा, कौन कहे तेरी माया।...
किसी ने हे परमेश्वर तेरा अंत कभी न पाया
कौन कहे तेरी महिमा, कौन कहे तेरी माया।...

पथिक।...


Monday, February 6, 2017

॥ वैदिक राष्ट्रीय प्रार्थना ॥

॥ वैदिक राष्ट्रीय प्रार्थना ॥

आ ब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायताम आ
राष्ट्रे राजन्य: शूर इषव्योऽतिव्याधी महारथो जायताम
दोग्ध्री: धेनुर्वोढ़ाऽनड्वानाशुः सप्ति: पुरन्धियोषा जिष्णु
रथेष्ठा: । सभेयो युवास्य यजमानस्य वीरो जायताम ।
निकामे निकामे न: पर्जन्यो वर्षतु फलवत्यो न औषधय:
पच्यन्ताम योगक्षेमो न: कल्पताम्। ॥ यजुर्वेद । २२, । मन्त्र । २२ । ॥

ब्रह्मन ! स्वराष्ट्र में हों , द्विज ब्रह्म तेजधारी ।
क्षत्रिय महारथी हों , अरिदल-विनाशकारी ॥
होवें दुधारू गौवें , वृषभाश्व आशुवाही ।
आधार राष्ट्र की हों , नारी सुभग सदा ही ॥
बलवान सभ्य योद्धा , यजमान -पुत्र होवें ।
इच्छानुसार वर्षें , पर्जन्य ताप धोवें ॥
फल-फूल से लदी हों , औषध अमोघ सारी ।
हो योगक्षेमकारी स्वाधीनता हमारी ॥